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PRESIDENT & FOUNDER

Mr. Shanker Sharma

(President & Founder)

Founder’s Message (संस्थापक का सन्देश)

हर साल जाते हैं एक देश से दूसरे देश।
मौसम के अनुसार हो जाते हैं परदेशी।।

 

परदेशी होना प्राकृतिक

 

परदेशी निर्विरोध होता है इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं होता है। परदेशी दुनिया में कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र होता है। परदेशी ही एक ऐसा शब्द है कभी न कभी हर कोई अपने जीवन में प्रवास पर होता है और परदेशी कहलाता है। यदि हम सनातन धर्म के उपनिषद व वेद की वाणी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को सही मायने में चरितार्थ करने का काम करता है। तो वो है परदेशी। परदेशी, एक से दूसरे स्थान पर जाकर अपने व दूसरों की संस्कृति का आदान-प्रदान हो या एक दूसरों के बीच आत्मीक रिश्ता जोड़ना, भाईचारा कायम करना व सामाजिक समरसता पैदा करना इत्यादि परदेशियों की प्राथमिकता रहती है। इस वसुधा को अपने देश व इस पर रहने वाले मनुष्य को अपना रिश्तेदार समझकर पूरी दुनिया का विचरण करने वाला परदेशी निश्छल व निर्विरोध होता है तथा अपना व दुनियां के विकास में ही विश्वास रखता है। इसलिए दुनियां भर में कहीं भी किसी भी प्रकार की परदेशियों की प्रतारणा का हम विरोध करते है। चाहे वो रंग भेद हो, भाषा भेद हो, धर्म भेद हो, नस्ल भेद, प्रांत भेद, जाति भेद हो इत्यादि।

 

परदेशी सर्वश्रेष्ठ
पूरी दुनिया मे परदेसियों को अलग- अलग तरह से प्रताड़ित किया जाता है। इसी प्रकार कि प्रताड़ना से पीड़ित होकर एक संघठन का जन्म हुआ जिसका नाम है ‘परदेशी उत्थान’हम परदेसियों कि अपनी कोई भी ऐसी संस्था नहीं है जो हम परदेसियों की सुरक्षा और सम्मान की लड़ाई लड़ सके। प्रत्येक वह व्यक्ति
परदेसी है जो अपने जन्म – स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर अपना व अपने परिवार का भरण – पोषण करता है, चाहे वह उसके अपने ही जिले का कोई क़स्बा व शहर क्यों न हो। कोई व्यक्ति एक दिन के लिए भी प्रवास करता है, तो वह भी परदेसी कहलाता है।
परदेसी निश्छल व निर्विरोध होता है। वह कही भी जाने मे स्वतंत्र होता है पूरी दुनिया को अपना ही देश समझकर पूरी दुनिया मे भ्रमण करने वाला परदेसी अपना और दुनिया के विकास मे ही विश्वास रखता है। परदेसी एक ऐसा शब्द है जो किसी शब्दकोश या विद्वानों द्वारा दिया गया शब्द नहीं है। वह तो गावँ के हृदय से प्रस्फुटित होकर स्वाभाविक रूप से निकला हुआ एक शब्द है। उदाहरण के तौर पर आज से 25-30 वर्ष पहले जब कोई व्यक्ति अपने गावँ से निकलकर अपने ही जिले के किसी शहर मे काम करने के लिए जाते थे, तो घर मे औरतें कहती थी – “चिंटू की पापा पैसे कमाने के लिए प्रदेश गए हैं। परदेसी ही है जो हमारे वेदो की वाणी को साकार करने का काम करता है। जैसे – ‘वसुधैव कुटुंबकम’ सनातन धर्म के मूल संस्कृति तथा विचारधारा है जो उपनिषद सहित कई ग्रंथो मे उपलब्ध है।
इसी के साथ हम सम्पूर्ण भूमण्डल पर कहीं भी परदेशियों के प्रति हो रहे किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करते हुए सुरक्षा व सम्मान दिलाने का प्रयास करते है। सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक व न्यायिक कोई भी कार्य क्यों न हो ‘परदेशी उत्थान’ संस्था बढ़ – चढ़कर कार्य करती है। संस्था परिवार परामर्श का भी कार्य करती है। परिवार के आपसी मतभेदों को दूर कर परिवार को जोड़ने का प्रयास करती है। संस्था इसी प्रकार के कार्य करते हुए परदेशी उत्थान और सामाजिक उत्थान का कार्य करती हैं।

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