” परदेशी सर्वश्रेष्ठ ”

जो आसमान में उड़ने का शौक रखता है, वो कभी गिरने का खौफ नहीं रखता ।

हर साल जाते हैं एक देश से दूसरे देश, मौसम के अनुसार हो जाते हैं परदेशी ।।

‘परदेशी होना प्राकृतिक‘

शंकर शर्मा, पुत्र श्री उपेंद्र शर्मा, उत्तर प्रदेश , गाज़ियाबाद के लोनी क्षेत्र में निवास कर रहे हैं। शंकर शर्मा मूल रूप से भागलपुर, बिहार (Motherland) का रहने वाला हैं। शंकर शर्मा पिछले लगभग 24 वर्षो (1993) से स्थायी तौर पर यहाँ निवास कर रहे हैं। जब शंकर शर्मा वहाँ आया तो बिहारी होने के कारण कुछ लोगों के द्वारा तब से अब तक प्रताड़ित किया जा रहे हैं। कुछ लोग तो मुझे हीन भावनाओ से देखते हैं। जब अपमानित किया जाता हैं, तब ऐसी अनुभूति होती है कि शंकर शर्मा भारतीय न होकर किसी दूसरे देश में आया हैं। जबकि मुझे सम्पूर्ण भारत को मेरा देश बताया गया था। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है, दिल्ली एन सी आर मे बाहर से आए लाखो परदेशी अपनी विषम परिस्थितियों से जूझते हुए वहाँ के स्थयी निवासी हो गए। इसी प्रकार दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, एवं देश के विभिन्न शहरों मे अलग- अलग राज्यों मे परदेशी आकर वहाँ के स्थायी निवासी हो गए है। सिर्फ वह सोचकर कि वह मेरा अपना देश है, शंकर शर्मा वहाँ का नागरिक हैं, शंकर शर्मा कही भी रहकर अपनी आजीविका चला सकता हैं। दुर्भाग्यवश यहाँ कि राजनीति व राजनेता हम परदेशियों को अपने ही देश मे पराया बना दिया है। कभी बिहारी कहकर, कभी उत्तर भारतीय कहकर, कभी हिंदी भाषी कहकर, हमें प्रताड़ित किया जाता है। कई जगह तो हिंदी भाषी कहकर हमे कतार मे खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया। यह सब सिर्फ भारत कि बात नहीं है, पूरी दुनिया मे हम परदेशियों को अलग- अलग तरह से प्रताड़ित किया जाता है। इसी प्रकार कि प्रताड़ना से पीड़ित होकर एक संघठन का जन्म हुआ जिसका नाम है परदेशी उत्थान।

हम परदेशियों कि अपनी कोई भी ऐसी संस्था नहीं है जो हम परदेशियों कि सुरक्षा और सम्मान कि लड़ाई लड़ सके। परदेसी- प्रत्येक वह व्यक्ति परदेशी है जो अपने जन्म -स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर अपना व अपने परिवार का भरण- पोषण करता है, चाहे वह उसके अपने ही जिले का कोई क़स्बा व शहर क्यों न हो। व फिर देश – विदेश हो, वे परदेशी कहलाते है। कोई व्यक्तिवादि एक दिन के लिए भी प्रवास करता है, तो वह भी परदेशी कहलाता है। परदेशी निश्छल व निर्विरोध होता है। वह कही भी जाने मे स्वतंत्र होता है, वह पूरीदुनिया को अपना ही देश समझकर पूरी दुनिया मे भ्रमण करने वाला परदेशी अपना और दुनिया के विकास मे ही विश्वास रखता है। परदेशी एक ऐसा शब्द है जो किसी शब्दकोश ( डिक्शनरी ) या विद्वानों द्वारा दिया गया शब्द नहीं है। वह तो गावँ के हृदय से प्रस्फुटित होकर स्वाभाविक रूप से निकला हुआ एक शब्द है।

उदाहरण के तौर पर आज से २५-३० वर्ष पहले जब कोई व्यक्ति अपने गावँ से निकलकर अपने ही जिले के शहर मे काम करने के लिए जाते थे, तो घर मे औरतें कहती थी – अरे चिंटू की मम्मी चिंटू की पापा कहाँ गए ? कहती थी – अरी बहन, चिंटू की पापा प्रदेश गए है कमाने खातिर। परदेशी ही है जो हमारे वेदो की वाणी को साकार करने का काम करता है। जैसे – ‘वसुधैव कुटुंबकम’ सनातन धर्म के मूल संस्कृति तथा विचारधारा है जो उपनिषद सहित कई ग्रंथो मे उपलब्ध है। वहाँ तक की भारतीय संसद के मुख्य द्वार पर भी लिखा हुआ है। ऐसी संस्कृति को लागू करने के काम भी परदेशी ही करती है। दूसरे स्थान पर जाकर वहाँ के लोगों से आत्मिक रिस्ता जोड़ना हो, भाईचारा का काम करना हो, अपने भाषा का आदान- प्रदान करना हो व अपनी संस्कृतियों का आदान- प्रदान करना इन सभी कार्यो मे परदेशियों की प्राथमिकता होती है। ‘अतिथि देवो भव ‘ – इन वाक्यों को भी चरितार्थ करने का काम परदेशियों का ही है। यदि परदेशी न हो तो इन सभी मूल भावनाओ का कोई महत्व नहीं रह जाएगा।

ज्यादातर विद्वा, महापुरुष, नेता, प्रदेश मे जाकर ही ख्याति (प्रसिद्धि) प्राप्त किये है। वे सभी लोग अपना जन्म स्थान छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर श्रेष्ठतम पद को प्राप्त किया है। इसलिए परदेशी सर्वश्रेष्ठ भी है। इसलिए विश्व मे कहीं भी किसी भी प्रकार के परदेशियों के साथ प्रताड़ना का भेदभाव होता है तो हम उसका विरोध करते है। चाहे रंग – भेद, नस – भेद, प्रांत – भेद, देश – भेद, भाषा – भेद, धर्म – भेद, या सामाजिक असामनता इत्यादि इन सबका हम विरोध करते है। इसी के साथ हम सम्पूर्ण भूमण्डल पर कहीं भी परदेशियों के प्रति हो रहे किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करते हुए सुरक्षा व सम्मान दिलाने का प्रयास करते है। सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक व न्यायिक कोई भी कार्य क्यों न हो परदेशी उत्थान संस्था बढ़ – चढ़कर कार्य करती है। जैसे- ग्रामीण कौशल विकाश के तहत गावँ मे युवक – युवतियों को प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती है।

जननी सुरक्षा के तहत गर्भवती महिलाओ को उचित जानकारी व चिकित्सा उपलब्ध कराने का कार्य करती है। गावँ के अत्यंत गरीब बच्चों को नि: शुल्क शिक्षा दिलाने का कार्य करती है। दिल्ली एन सी आर में रह रहे परदेशियों को विषम परिस्थितियों में सहयोग करने का कार्य करती है । उदाहरण स्वरुप – लोनी भोपुरा रोडपर एक मजदूर की ट्रक दुर्घटना में अकाल – मृत्यु हो जाती है, उसका कोई अपना रिस्तेदार न होने के कारण हम परदेशी उत्थान के कार्यकर्ताओ द्वारा उसके परिजनों को गावँ में बुलाकर उसका अंतिम संस्कार करवाया तथा ट्रक ड्राइवर के खिलाफ मुकदमा लिखवाकर दो साल बाद न्यायालय द्वारा सात लाख का मुआवजा दिलवाकर परदेशी का सहयोग किया। संस्था परिवार परामर्श का भी कार्य करती है। परिवार के आपसी मतभेदों को दूर कर परिवार को जोड़ने का प्रयास करती है। संस्था इसी प्रकार के कार्य करते हुए परदेशी उत्थान का कार्य करती हैं।

जो आसमान में उड़ने का शौक रखता है, वो कभी गिरने का खौफ नहीं रखता ।

हर साल जाते हैं एक देश से दूसरे देश, मौसम के अनुसार हो जाते हैं परदेशी ।।

‘परदेशी होना प्राकृतिक‘

मैं शंकर शर्मा, पुत्र श्री उपेंद्र शर्मा, उत्तर प्रदेश , गाज़ियाबाद के लोनी क्षेत्र में निवास कर रहा हूँ। में मूल रूप से बिहार, भागलपुर (Motherland) का रहने वाला हूँ। मै पिछले लगभग 24 वर्षो (1993) से स्थायी तौर पर यहाँ निवास कर रहा हूँ। जब मै वहाँ आया तो बिहारी होने के कारण कुछ लोगों के द्वारा तब से अब तक प्रताड़ित किया जा रहा हूँ। कुछ लोग तो मुझे हीन भावनाओ से देखते हैं। जब अपमानित किया जाता हूँ, तब ऐसी अनुभूति होती है कि मै भारतीय न होकर किसी दूसरे देश मै आया हूँ। जबकि मुझे सम्पूर्ण भारत को मेरा देश बताया गया था। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है, दिल्ली एन सी आर मे बाहर से आए लाखो परदेशी अपनी विषम परिस्थितियों से जूझते हुए वहाँ के स्थयी निवासी हो गए। इसी प्रकार दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, एवं देश के विभिन्न शहरों मे अलग- अलग राज्यों मे परदेशी आकर वहाँ के स्थायी निवासी हो गए है। सिर्फ वह सोचकर कि वह मेरा अपना देश है, मै वहाँ का नागरिक हूँ, मै कही भी रहकर अपनी आजीविका चला सकता हूँ, दुर्भाग्यवश यहाँ कि राजनीति व राजनेता हम परदेशियों को अपने ही देश मे पराया बना दिया है। कभी बिहारी कहकर, कभी उत्तर भारतीय कहकर, कभी हिंदी भाषी कहकर, हमें प्रताड़ित किया जाता है। कई जगह तो हिंदी भाषी कहकर हमे कतार मे खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया। यह सब सिर्फ भारत कि बात नहीं है, पूरी दुनिया मे हम परदेशियों को अलग- अलग तरह से प्रताड़ित किया जाता है। इसी प्रकार कि प्रताड़ना से पीड़ित होकर एक संघठन का जन्म हुआ जिसका नाम है परदेशी उत्थान हम परदेशियों कि अपनी कोई भी ऐसी संस्था नहीं है जो हम परदेशियों कि सुरक्षा और सम्मान कि लड़ाई लड़ सके। परदेसी- प्रत्येक वह व्यक्ति परदेशी है जो अपने जन्म -स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर अपना व अपने परिवार का भरण- पोषण करता है, चाहे वह उसके अपने ही जिले का कोई क़स्बा व शहर क्यों न हो। व फिर देश – विदेश हो, वे परदेशी कहलाते है। कोई व्यक्तिवादि एक दिन के लिए भी प्रवास करता है, तो वह भी परदेशी कहलाता है। परदेशी निश्छल व निर्विरोध होता है। वह कही भी जाने मे स्वतंत्र होता है, वह पूरीदुनिया को अपना ही देश समझकर पूरी दुनिया मे भ्रमण करने वाला परदेशी अपना और दुनिया के विकास मे ही विश्वास रखता है। परदेशी एक ऐसा शब्द है जो किसी शब्दकोश ( डिक्शनरी ) या विद्वानों द्वारा दिया गया शब्द नहीं है। वह तो गावँ के हृदय से प्रस्फुटित होकर स्वाभाविक रूप से निकला हुआ एक शब्द है। उदाहरण के तौर पर आज से 25-30 वर्ष पहले जब कोई व्यक्ति अपने गावँ से निकलकर अपने ही जिले के शहर मे काम करने के लिए जाते थे, तो घर मे औरतें कहती थी – अरे चिंटू की मम्मी चिंटू की पापा कहाँ गए ? कहती थी – अरी बहन, चिंटू की पापा प्रदेश गए है कमाने खातिर। परदेशी ही है जो हमारे वेदो की वाणी को साकार करने का काम करता है। जैसे – ‘वसुधैव कुटुंबकम’ सनातन धर्म के मूल संस्कृति तथा विचारधारा है जो उपनिषद सहित कई ग्रंथो मे उपलब्ध है। वहाँ तक की भारतीय संसद के मुख्य द्वार पर भी लिखा हुआ है। ऐसी संस्कृति को लागू करने के काम भी परदेशी ही करती है। दूसरे स्थान पर जाकर वहाँ के लोगों से आत्मिक रिस्ता जोड़ना हो, भाईचारा का काम करना हो, अपने भाषा का आदान- प्रदान करना हो व अपनी संस्कृतियों का आदान- प्रदान करना इन सभी कार्यो मे परदेशियों की प्राथमिकता होती है। ‘अतिथि देवो भव ‘ – इन वाक्यों को भी चरितार्थ करने का काम परदेशियों का ही है। यदि परदेशी न हो तो इन सभी मूल भावनाओ का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। ज्यादातर विद्वा, महापुरुष, नेता, प्रदेश मे जाकर ही ख्याति (प्रसिद्धि) प्राप्त किये है। वे सभी लोग अपना जन्म स्थान छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर श्रेष्ठतम पद को प्राप्त किया है। इसलिए परदेशी सर्वश्रेष्ठ भी है। इसलिए विश्व मे कहीं भी किसी भी प्रकार के परदेशियों के साथ प्रताड़ना का भेदभाव होता है तो हम उसका विरोध करते है। चाहे रंग – भेद, नस – भेद, प्रांत – भेद, देश – भेद, भाषा – भेद, धर्म – भेद, या सामाजिक असामनता इत्यादि इन सबका हम विरोध करते है। इसी के साथ हम सम्पूर्ण भूमण्डल पर कहीं भी परदेशियों के प्रति हो रहे किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करते हुए सुरक्षा व सम्मान दिलाने का प्रयास करते है। सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक व न्यायिक कोई भी कार्य क्यों न हो परदेशी उत्थान संस्था बढ़ – चढ़कर कार्य करती है। जैसे- ग्रामीण कौशल विकाश के तहत गावँ मे युवक – युवतियों को प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती है। जननी सुरक्षा के तहत गर्भवती महिलाओ को उचित जानकारी व चिकित्सा उपलब्ध कराने का कार्य करती है। गावँ के अत्यंत गरीब बच्चों को नि: शुल्क शिक्षा दिलाने का कार्य करती है। दिल्ली एन सी आर में रह रहे परदेशियों को विषम परिस्थितियों में सहयोग करने का कार्य करती है । उदाहरण स्वरुप – लोनी भोपुरा रोडपर एक मजदूर की ट्रक दुर्घटना में अकाल – मृत्यु हो जाती है, उसका कोई अपना रिस्तेदार न होने के कारण हम परदेशी उत्थान के कार्यकर्ताओ द्वारा उसके परिजनों को गावँ में बुलाकर उसका अंतिम संस्कार करवाया तथा ट्रक ड्राइवर के खिलाफ मुकदमा लिखवाकर दो साल बाद न्यायालय द्वारा सात लाख का मुआवजा दिलवाकर परदेशी का सहयोग किया। संस्था परिवार परामर्श का भी कार्य करती है। परिवार के आपसी मतभेदों को दूर कर परिवार को जोड़ने का प्रयास करती है। संस्था इसी प्रकार के कार्य करते हुए परदेशी उत्थान का कार्य करती हैं।

 

” परदेशी सर्वश्रेष्ठ ”

शंकर शर्मा
अध्यक्षपरदेशी उत्थान

Phone :- 9810347161